संसाधन किसे कहते हैं? Sansadhan Kise Kahate Hain

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Sansadhan Kise Kahate Hain

Hello दोस्तों अगर आपको पता नहीं है कि संसाधन किसे कहते हैं (Sansadhan Kise Kahate Hain) और संसाधन के कितने प्रकार होते हैं (Sansadhan Kitne Prakar Ke Hote Hai) तो चिंता करने कि कोई बात नहीं है क्योंकि आज मै आपको इसके बारे में पूरे विस्तार से बताने जा रहा हूं। संसाधन के बारे में लोगो के बारे में बहुत सी विचारधारा है। सभी लोग इसे अलग अलग तरीके से परिभाषित करते हैं।

संसाधन किसे कहते हैं ( Sansadhan Kise Kahate Hain)?

आप अपने जीवन में अनेक वस्तुओं का उपयोग करते हैं। उपयोग में आने वाली ये सभी वस्तुएँ संसाधन हैं। संसाधन भौतिक और जैविक दोनों हो सकते हैं। जहाँ तक एक ओर भूमि, मृदा, जल, खनिज जैसे भौतिक पदार्थ मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति में सहायक होकर संसाधन बन जाते हैं, वहीं दूसरी ओर जैविक पदार्थ, यथा, वनस्पति, वन्य-जीव तथा जलीय-जीव, मानवीय-जीवन को सुखमय बनाने में पीछे नहीं हैं।

वर्तमान परिवेश में सेवा को भी संसाधन में गया है। कोई गायक या कवि या चित्रकार अपने क्रिया कलाप से पैसा कमाता है या खुद को संतुष्ट करता है, तब उसके द्वारा ये कार्य कलाप भी संसाधन कहलाएंगे। कवि का कविता रचना, चित्रकार की चित्रकारी, गायक की गायिकी भी संसाधन हैं।

सच तो यह है कि मानव स्वयं भी संसाधन है। क्योंकि, इनके पास ज्ञान (तकनीक) होता है, जिसके सहारे वह किसी भी वस्तु को उपयोगी बना सकता है। अत: यह धारणा भ्रामक है
कि संसाधन एक प्राकृतिक उपहार है।

संसाधन किसी भी देश का आर्थिक- सामाजिक मेरूदंड होता है। संसाधन विपन्न राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय दौड़ में पिछड़ जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं प्रौद्योगि है कि प्राकृतिक संसाधन से सम्पन्न राष्ट्र ही विकास करते हैं। जापान एक ऐसा देश है; जो प्राकृतिक संसाधन में अत्यंत विपन्न है।

किन्तु, इनके मानव संसाधन, तकनीकी दृष्टि से, इतने सबल हैं कि यह देश उपलब्ध सभी पदार्थों का विवेकपूर्ण उपयोग कर विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा है। अतः किसी देश के विकास में भौतिक एवं जैविक संसाधन के साथ-साथ मानव संसाधन की भी बहुत भूमिका होती है।

विविध संसाधनों के मध्य मानव नियंत्रक की स्थिति में रहता है; जो पर्यावरण में पदार्थों, प्रौद्योगिकी (तकनीक) एवं संस्थाओं के बीच अन्तर्संबंध स्थापित करता है, जिससे पर्यावरण संर के पदार्थ उपयोगी बन जाते हैं।

संसाधनों का वर्गीकरण 

  • उत्पत्ति के आधार पर-जैव और अजैव
  • उपयोगिता के आधार पर-नवीकरणीय और अनवीकरणीय
  • स्वामित्व के आधार पर-व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय
  • विकाश की स्थिति के आधार पर संभाव्या, विकसित, भंडार और संचित

संसाधनों के प्रकार

उत्पत्ति के आधार पर संसाधन के दो प्रकार हो सकते हैं:-

जैव संसाधन : ऐसे संसाधनों की प्राप्ति जैव मंडल से होती है। इनमें सजीव के सभी लक्षण मौजूद होते हैं। जैसे-मुनष्य, वनस्पति, मत्स्य, पशुधन एवं अन्य प्राणि समुदाय।

अजैव संसाधन : निर्जीव वस्तुओं के समूह को अजैव संसाधन कहा जाता है। जैसे-चट्टानें, धातु एवं खनिज आदि।

उपयोगिता के आधार पर संसाधन के दो वर्ग होते हैं:-

नवीकरणीय संसाधन: वैसे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रिया द्वारा नवीकृत या पुनः प्राप्त किये जा सकते हैं। जैसे-सौर-ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, विद्युत, वन एवं वन्य प्राणी । जिन्हें सतत् या प्रवाह एवं जैव संसाधनों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

अनवीकरणीय संसाधन : ऐसे संसाधनों का विकास लंबी अवधि में जटिल प्रक्रियाओं द्वारा होता है। इस प्रक्रिया को पूरा होने में लाखों वर्ष लग सकते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी संसाधन होते हैं, जो पुनः चक्रिय नहीं हैं। एक बार प्रयोग होने
के साथ ही वे समाप्त हो जाते हैं। जैसे-जीवाश्म ईंधन।

स्वामित्व के आधार पर संसाधन के चार प्रकार हो सकते हैं:-

व्यक्तिगत संसाधन : ऐसे संसाधन किसी खास व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में होता है। जिसके बदले में वे सरकार को लगान भी चुकाते है। जैसे-भूखंड, घर व अन्य जायदाद; जिसपर लोगों का निजी स्वामित्व होता है। बाग-बगीचा, तालाब, कुआँ इत्यादि भी ऐसे संसाधन ही हैं, जिस पर व्यक्ति निजी स्वामित्व रखता है।

सामुदायिक संसाधन: ऐसे संसाधन किसी खास समुदाय के आधिपत्य में होता है, जिसका उपयोग समूह के लिए सुलभ होता है। गाँवों में चारण-भूमि, श्मशान, मंदिर या मस्जिद परिसर, सामुदायिक भवन, तालाब आदि।

नगरीय क्षेत्र में इस प्रकार के संसाधन : सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल, खेल मैदान, मंदिर, 7 मस्जिद, गुरूद्वारा एवं गिरिजाघर के रूप में हैं ये संसाधन सम्बन्धित समुदाय लोगों के लिए सर्वसुलभ होते हैं।

राष्ट्रीय संसाधन : किसी भी देश में जितने भी संसाधन उपलब्ध होते हैं वे सब राष्ट्रीय संसाधन कहलाते हैं। सरकार को ये हक है कि वो उनका उपयोग अपने आम जनता के भलाई में कर सकती है। आपने अपने गाँवों में या आसपास के क्षेत्रों में भी शहरी विकास प्राधिकरण का बोर्ड देखा होगा। इसे सरकार ने भूमि अधिग्रहित करने हेतु अधिकृत किया है। ये भूमि सहित अन्य नगरीय संसाधनों का विकास करते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय संसाधन : ऐसे संसाधनों का नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय संस्था करती है। तट रेखा से 200 कि०मी० की छोड़कर खुले महासागरीय संसाधनों पर किसी देश का अधिपत्य नहीं होता है। ऐसे संसाधन का उपयोग सिर्फ अनुसंधान हेतु अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति से किसी राष्ट्र द्वारा किया जा सकता है।

विकास के स्तर पर संसाधन के भाग:-

संभावी संसाधन : ऐसे संसाधन जो किसी क्षेत्र विशेष में मौजूद होते हैं, जिसे उपयोग में लाये जाने की संभावना रहती है। इसका उपयोग अभी तक नहीं किया गया है।

विकसित संसाधन : ऐसे संसाधन जिनका सर्वेक्षणोपरांत उपयोग हेतु मात्रा एवं गुणवत्ता का निर्धारण हो चुका है। पूर्व में भी यह बताया जा चुका है कि संसाधनों को विकास तकनीक और उनकी संभाव्यता पर निर्भर है।

भंडार संसाधन: ऐसे संसाधन पर्यावरण में उपलब्ध होते हैं तथा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम हैं। उपयोग के उपयुक्त प्रोद्योगिकी के अभाव में इन्हें केवल भंडारित संसाधन के रूप में देखा जाता है।

संचित कोष संसाधन: वास्तव में ऐसे संसाधान भंडार संसाधन के ही अंश हैं, जिसे उपलब्ध तकनीक के आधार पर प्रयोग में लाया जा सकता है। इनका तत्काल उपयोग प्रारंभ नहीं हुआ है। यह भविष्य की पूँजी है। नदी जल भविष्य में जल-विद्युत उत्पन्न करने में उपयुक्त हो सकते हैं। वर्तमान में इसका उपयोग अत्यंत ही सीमित है। ऐसे संसाधन वन में या बाँधों में उल के रूप में संचित हैं।

संसाधन नियोजन क्या होता है?

संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग ही संसाधन नियोजन है। वर्तमान परिवेश में संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग हमारे सामने चुनौती बनकर खड़ा है। संसाधनों के विवेकपूर्ण दोहन हेतु सर्वमान्य रणनीति तैयार करना संसाधन नियोजन की प्राथमिकता है।

किसी भी देश के विकास के लिए संसाधन नियोजन बहुत जरूरी होता है। भारत को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है क्योंकि यहां संसाधनों कि उपलब्धता में बहुत विभिन्नता है और इसके साथ साथ अधिक जनसंख्या भी है। यहाँ कई ऐसे प्रदेश हैं जो संसाधन सम्पन्न हैं। कई ऐसे भी प्रदेश हैं जो संसाधन की दृष्टि से काफी विपन्न हैं।

कुछ ऐसे भी प्रदेश हैं जहाँ एक ही प्रकार के संसाधनों का प्रचुर भंडार है और अन्य दूसरे संसाधनों में वह गरीब हैं। जैसे-झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ आदि ऐसे प्रदेश हैं, जहाँ खनिज एवं कोयला का प्रचुर भंडार है। उसी प्रकार बिहार भी चूना-पत्थर एवं पाइराईट जैसे खनिजों में धनी है।

अरूणाचल प्रदेश में जल संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। परन्तु कतिपय कारणों से उसका विकास नहीं हो पाया है। राजस्थान में सौर ऊर्जा के साथ-साथ पवन ऊर्जा की प्रचुरता है। परन्तु यह राज्य जल संसाधन की दृष्टि से अति निर्धन है। भारत के अंतर्गत लद्दाख जैसे भी क्षेत्र हैं, जो शीत मरूस्थल के रूप में अन्य भागों अलग-थलग हो गया है।

लेकिन यह प्रदेश सांस्कृतिक विरासत का धनी है। यहाँ जल, महत्वपूर्ण खनिज एवं मौलिक अवसंरचना की बहुत कमी है। अतः राष्ट्रीय, प्रांतीय तथा अन्य स्थानीय स्तरों पर संसाधनों के समायोजन एवं संतुलन के लिए संसाधन-नियोजन की अनिवार्य आवश्यकता है।

संसाधनों का संरक्षण

सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में संसाधनों की अहम् भूमिका होती है। किन्तु, संसाधनों का अविवेकपूर्ण या अतिशय उपयोग विविध प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देते हैं। इन समस्याओं के समाधान हेतु विभिन्न स्तरों पर संरक्षण की आवश्यकता है।

संसाधनों का नियोजित एवं विवेकपूर्ण उपयोग ही संरक्षण कहलाता है। प्राचीन काल से ही संसाधनों का संरक्षण, समाज सुधारकों, नेताओं, चिंतकों एवं पर्यावरणविदों के लिए एक चिन्तनीय ज्वलंत विषय रहा है। इस संदर्भ में महान् दार्शनिक एवं चिंतक महात्मा गाँधी के विचार प्रासांगिक है- “हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत कुछ हैं, लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।”

मेधा पाटेकर का ‘नर्मदा बचाओ अभियान’, सुन्दर लाल बहुगुणा का ‘चिपको आंदोलन’, एवं संदीप पांडेय द्वारा वर्षा-जल संचय कर कृषित भूमि का विस्तार , संसाधन संरक्षण की दिशा में अत्यंत सराहनीय कदम है।

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